स्त्री रूढ़िवादिता के खिलाफ बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद की पहल

 

लक्ष्मी कुमारी

शोध छात्रा एंव यू.जी.सी. नेट, इतिहास विभाग, बी. आर. ए. बी. विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार

 

ABSTRACT:

आधुनिक बिहार के निर्माता बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद, दृढ़ निश्चय वाले और वचन के पक्के युग पुरूष थे। उन्होने न सिर्फ बिहार के लिये, अपितु संपूर्ण भारत के लिये एक ईमानदार और सच्चे कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया। इन्होने देश की आजादी के संघर्ष के दौरान एवं उसके पूर्व से ही, राजनैतिक क्षेत्र के साथ.साथ सामाजिक बदलाव के लिये भी एक अच्छे समाज-सुधारक के तौर पर अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका स्पष्ट रूप से यह मानना था कि आधी आबादी अर्थात् स्त्रियों के सामाजिक, बौद्धिक और आर्थिक उत्थान के बिना पूरे समाज का दीर्घकालिक उत्थान असंभव है।

 

मुगलों के शासन काल के पूर्व स्त्रीबौद्धिक संपदा से संपन्न शरतवर्ष मुगलों की लंबी शासन के दौरान कतिपय धार्मिक कारणों से स्त्रियों की अवस्था को संभाले रखने में पूर्णरूपेन पिछड़ गया। इस समय समाज में खासकर स्त्रियों के प्रति गंभीर रूढ़िवादी विचारधारा व्याप्त थी जिसके कारण अधिकांश महिलायें चार दीवारी के अंदर ही रहती थी। गरीब व मध्यम वर्ग में स्त्रियां जहां घर के काम.काज और बच्चे जनने के कार्य तक सीमित थीं वहीं अमीर घरों के लिये वे मात्र भोग व विलास की सामाग्री थी।

 

यद्यपि 19वीं सदी के अंतिम दशक तक कुछेक महिलायें शिक्षित होने लगी थी तथापि उस समय तक भी महिलाओं के लिये नियम चार दीवारी तक ही सीमित थी। देश के उत्तर-पूर्वी भाग की हालत इस लिहाज से कुछ ज्यादा ही बुरी थी। जब ब्रजकिशोर बाबू ने चंपारण आंदोलन के दौरान देहाती क्षेत्र में  महाराष्ट्र और गुजरात की महिलायें को कस्तुरबा और अन्य क्रांतिकारी महिलाओं के साथ काम करते देखा तो उन्होने अनुभव किया की बिहार की महिलाओं को भी इस तरह के कार्यों में भागीदारी करनी चाहिए। इसके लिये ब्रजकिशोर प्रसाद आगे आये और स्त्रियों की स्थिति में सुधार का कार्य अपने घर से प्रारंभ किया। उन्होने अपनी बेटी प्रभावती को समाज-सेविका के रूप में काम करने के लिये प्रेरित किया और प्रभा को गांधीजी के पास वर्धा के साबरमती आश्रम में भेजा। 20वीं सदी के आरंभ के दिनों में बिहार के अत्यंत रूढ़िग्रस्त समाज की लड़की का इस तरह निर्भीकता से विचरण करना एक महान आश्चर्य ही था। ब्रजकिशोर बाबू ने प्रभावती को शादी के बाद पर्दा के बेज़ा इस्तेमाल से बचने और ससुराल में सबों से अपने घर जैसे व्यवहार की सीख दी। ब्रजकिशोर की यह भावना महिलाओं को पर्दा.प्रथा के बुरे प्रभाव से निकालने के लिये था। वे चाहते थे कि महिलायें, पुरूषों के बराबर राजनीतिक गतिविधयों में भाग लें।

 

जनवरी, 1919 ई. में अखिल भारतीय महिला-सम्मेलन का आयोजन पटना में हुआ। इस अवसर पर बिहार की स्त्रियों को देश के अन्य प्रांतों की बहनों से मिलने तथा अपनी तरक्की और आजादी के संबंध में चर्चाएं करने का अवसर मिला।

 

 

 

इसके बाद ही एक बिहारी महिला-सम्मेलन का आयोजन दिसम्बर, 1919 ई. में हुआ, जिसमें बाल-विवाह तथा पर्दा एव ंदहेज प्रथाओं के विरोध में प्रस्ताव स्वीकृत किये गये। सम्मेलन ने इस प्रांत में स्त्री-शिक्षा के प्रसार पर भी विशेष बल दिया। सन् 1920 के अंत तक अधिक-से-अधिक महिलओं की भागीदारी राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में होने लगी थी। यह ब्रजकिशोर प्रसाद के अथक प्रयास का ही फल था कि काफी संख्या में बिहारी महिलायें सार्वजनिक सेवा में उतरी और रचनात्मक कार्यों में लगी। निसंदेह रूप से अब समाज रूढ़िवादी विचारधारा से धीरे-धीरे निकलकर आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ता नजर आ रहा था।

 

ज्ञम्ल् ॅव्त्क्ै. रूढ़िवादिता, जाति, पर्दा-प्रथा, दहेज-प्रथा, बाल-विवाह, आधुनिकता, स्वाबलंबन, सत्याग्रह।

 

आधुनिक बिहार के निर्माता बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद, दृढ़ निश्चय वाले और वचन के पक्के युग पुरूष थे। जिन्होने न सिर्फ बिहार के लिये, अपितु संपूर्ण भारत के लिये एक ईमानदार और सच्चे कार्यकर्ता के रूप में कार्य किया। ब्रजकिशोर बाबू ने अपनी तपस्या, त्याग, और बलिदान से देश में राजनैतिक क्षेत्र के साथ-साथ सामाजिक क्षेत्र में भी बदलाव किये। ब्रजकिशोर बाबू का यह मानना था कि  आधी आबादी अर्थात् स्त्रियों के सामाजिक, बौद्धिक और आर्थिक उत्थान के बिना पूरे समाज का दीर्घकालिक उत्थान असंभव है।

 

मुगलों के शासन काल के पूर्व स्त्रीबौद्धिक संपदा से संपन्न शरतवर्ष मुगलों की लंबी शासन के दौरान कतिपय धार्मिक कारणों से स्त्रियों की अवस्था को संभाले रखने में पूर्णरूपेन पिछड़ गया। इस समय समाज में खासकर स्त्रियों के प्रति गंभीर रूढ़िवादी विचारधारा व्याप्त थी जिसके कारण अधिकांश महिलायें चार दीवारी के अंदर ही रहती थी। गरीब व मध्यम वर्ग में स्त्रियां जहां घर के काम.काज और बच्चे जनने के कार्य तक सीमित थीं वहीं अमीर घरों के लिये वे मात्र भोग व विलास की सामाग्री थी।

 

यद्यपि 19वीं सदी के अंतिम दशक तक कुछेक महिलायें शिक्षित होने लगी थी तथापि उस समय तक भी महिलाओं के लिये नियम चार दीवारी तक ही सीमित थी। देश के उत्तर-पूर्वी भाग की हालत इस लिहाज से कुछ ज्यादा ही बुरी थी। जब ब्रजकिशोर बाबू ने चंपारण आंदोलन के दौरान देहाती क्षेत्र में  महाराष्ट्र और गुजरात की महिलायें को कस्तुरबा और अन्य क्रांतिकारी महिलाओं के साथ काम करते देखा तो उन्होने अनुभव किया की बिहार की महिलाओं को भी इस तरह के कार्यों में भागीदारी करनी चाहिए।

 

इसके पूर्व ही ब्रजकिशोर प्रसाद समाज में व्याप्त रूढ़िवादी विचारधारा के खिलाफ कदम उठा चुके थे। इस समय रूढ़िवादी हिन्दू विदेश की यात्रा करके आये अपने उन देशवासियों पर नाराजगी दिखाते थे। वे उन्हे अपने समुदाय से निकाल देते थे, उनके साथ न तो खाना खाते, न उन्हें अपने घर बुलाते, न उनके बेटियों के साथ रिश्ता करते। इस तरह की रूढ़िवादी सोच से स्वामी विवेकानंद को भी गुजरना पड़ा था, जब वे प्रथम विदेश यात्रा से वापस भारत आये थे। जिसके वजह से उन्हे मंदिर में प्रवेश करने से वर्जित कर दिया गया था। ये रूढ़िवादी विचारधारा उस समय समाज मे इस कदर गहराई तक व्याप्त था कि, जिसे जड़ से समाप्त करना अतिआवश्यक हो गया था। ब्रजकिशोर बाबू के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती थी, जिसे वे समाप्त करना चाहते थे।

इससे जुड़ा एक प्रसंग उल्लेखनीय है जिसका जिक्र राजेन्द्र प्रसाद ने अपने आत्मकथा में भी किया है। जब डाॅ. गणेश प्रसाद विदेश से शिक्षा प्राप्तकर भारत वापस आ रहे थे। देश में उनके पहुंचने के पहले से ही एक आंदोलन उठ खड़ा हो गया था कि उनको जाति में ले लेना चाहिए। जिससे यहां लोग दो दल मे विभाजित हो गये। एक सुधारक दल के नेता बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद थे, जो अभी नये उठते हुए वकील थे और दुसरा विरोधी दल के नेता दो सबसे प्रतिष्ठित और नामी बूढ़े वकील थे। ब्रजकिशोर प्रसाद के प्रयास से एक मिटिंग बुलाई गई, जहां दोनो विचार वाले आमने-सामने बैठे तथा दोनों दलों के बीच काफी बहस चली। इस दौरान कंजरवेटिभ दल के लोगों के उत्साह मे कमी आ रहा था, उन्हे ऐसा लग रहा था कि स्नातक लोग उदारवादी दल के पक्ष मे है और वे विदेश यात्रा के पक्ष मे है। इन्हे अपने उत्साह मे सबसे ज्यादा कमी तब महसूस होने लगा जब दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह प्रथम गोलमेज सम्मेलन मे भाग लिया और वहां मिथिला के ब्रहाम्ण भी मौजूद था। शीघ्र ही विपक्षी विदेश-यात्रा के प्रति उदासीन दिख रहे थे। अब इसका विरोध कम होने लगा था।

 

ब्रजकिशोर प्रसाद अपने स्वभाव के अनुसार लिखने या बोलने में विश्वास नहीं करते थे, वे कुछ करने में विश्वास करते थे। इसके लिये ब्रजकिशोर प्रसाद आगे आये और स्त्रियों की स्थिति में सुधार का कार्य अपने घर से प्रारंभ किया। उन्होने अपनी बेटी प्रभावती को समाज-सेविका के रूप में काम करने के लिये प्रेरित किया। प्रभावती ब्रजकिशोर प्रसाद की प्रथम संतान थी। ब्रजकिशोर प्रसाद ने प्रभावती का लालन-पालन बेटा की तरह किया था। प्रभावती लड़के की तरह कुर्ता-पैजामा पहना करती, बाल भी उसके लड़के की तरह कटे हुए थे। उनके शिक्षा की ओर उन्होने ध्यान दिया। घर में शिक्षक की व्यवस्था की। पिता ने उसे लड़के की तरह पढ़ाया, लड़के की तरह बढ़ाया। हर समय वे जोड़ डालते थे कि उसे पर्दा प्रथा का पालन नहीं करना चाहिए। प्रभा उनके साथ मीटिंगों में शरीक होती, समाज की समस्याओं की चर्चा सुनती। 20वीं सदी के आरंभ के दिनों में बिहार के अत्यंत रूढ़िग्रस्त समाज की लड़की का इस तरह निर्भीकता से विचरण करना, एक महान आश्चर्य ही था। ब्रजकिशोर प्रसाद एक वकील थे, फिर भी सादगी के हिमायती थे, जिसका गहरा असर उनकी लाडली बेटी के जीवन पर पड़ा। पिता के जीवन में भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा प्रेम और आधुनिक सुधारवादी विचारों का संगम था।

 

ब्रजकिशोर बाबू प्रभावती से अक्सर कहा करते थे कि शादी के बाद पर्दा का इस्तेमाल नहीं करना, ससुर से बाते करना। साधारणतः उस समय बहुए़ंॅ अपने ससुर से बाते नहीं करती थी। उन्होने कहा कि जब वह ससुर से बाते करे तो उस दौरान पर्दा का इस्तेमाल नहीं करे।

 

सामाजिक सुधार के पक्षपाती ब्रजकिशोर प्रसाद की बेटी की शादी मे तिलक-दहेज की कोई बात ही नहीं था। उत्साह, उमंग और पूरी सादगी के साथ विवाह संपन्न हुआ। इस विवाह के बाद सबसे महत्वपूर्ण बाते यह हुआ कि 1920 में रूढ़िप्रिय समाज में प्रभावती दुलहिन बनकर अपना ससुराल (सिताबदियारा) आयी लेकिन पर्दा किये बिना। दुलहिन के लिये आयी हुई डोली खाली लौट गयी। दुल्हा-दुलहिन पैदल ही घर पहुॅंचे। ग्रामीण समाज में मानों भूचाल-सा आ गया। प्रभावती का उठाया हुआ यह कदम ब्रजकिशोर प्रसाद के शिक्षा का ही देन था।

 

ब्रजकिशोर बाबू दृढ़ निश्चयी थे कि भारतीय महिला को बंधन से मुक्त होना चाहिए। उन्हें पर्दा से बाहर आना चाहिए और राजनीतिक जीवन में भाग लेना चाहिए। वे इसे उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करने में विश्वास रखते थे। प्रभावती का चरित उनके सोच के रूप में समानता प्रस्तुत करते है।

 

प्रभावती भाग्यशाली थी कि उनके पति जयप्रकाश नारायण खुले विचारों के थे और वे इस बात से भी सहमत थे कि प्रभावती को पर्दा नहीं करना चाहिए। जब ब्रजकिशोर बाबू ने प्रस्ताव दिया कि प्रभावती को गांधी जी के आश्रम में जाना चाहिए और वहां रहें, उन्होने कोई आपत्ति नहीं की। उस समय नवोदित लड़की को आश्रम में अजनबी के बीच भेजना वर्जित था। ब्रजकिशोर बाबू प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दोनो तरह से महिलाओं को दासत्व से मुक्त कराना चाहते थे। उन्होने अपनी बेटी प्रभा को गांधीजी के पास वर्धा के साबरमती आश्रम में भेजा। ब्रजकिशोर बाबू का यह निर्णय इस बात की ओर इशारा करता है कि वे महिलाओं को पर्दा के पीछे से निकालना चाहते थे। वे चाहते थे कि महिला-पुरूष के बराबर राजनीतिक गतिविधियों मे भाग ले।

 

जनवरी, 1919 ई. में अखिल भारतीय महिला-सम्मेलन का आयोजन पटना में हुआ। इस अवसर पर बिहार की स्त्रियों को देश के अन्य प्रांतों की बहनों से मिलने तथा अपनी तरक्की और आजादी के संबंध में चर्चाएं करने का अवसर मिला। इसके बाद ही एक बिहारी महिला-सम्मेलन का आयोजन दिसम्बर, 1919 ई. में हुआ, जिसमें बाल-विवाह तथा पर्दा एव ंदहेज प्रथाओं के विरोध में प्रस्ताव स्वीकृत किये गये। सम्मेलन ने इस प्रांत में स्त्री-शिक्षा के प्रसार पर भी विशेष बल दिया।

सन् 1920-21 में असहयोग आंदोलन के दौरान महिलाओं ने विदेशी वस्त्रों के बहिस्कार और शराबबंदी, खरीदारों को उकसाया। अब बिहार की स्त्रियां एक नये जीवन का अनुभव करने लगी थी। पुरूषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की स्वतंत्रता के संग्राम में भाग लेने के लिए के निर्भीेकता पूर्वक आने लगी।

 

इसी दौरान पटना हाईकोर्ट के नामी ऐडवोकेट अवधेश नंदन सहाय जी की पत्नी श्री मति सावित्रि देवी ने भी खादी चर्खा प्रसार और पर्दा प्रथा के उन्मूलन में तथा स्त्रियों में स्वाबलंवन का भाव जगाने में अपना सक्रिय भूमिका निभायी।

एक माइनिंग इंजीनियर मुंशी अंबिकाचरण की पत्नी श्रीमति विन्ध्यावासिनी देवी ने शराब की दुकानो पर धरना दी। इस कार्यक्रम में भी अनेक स्त्रियां सम्मिलित हुई और इस आंदोलन ने ऐसा जोड़ पकड़ा कि पटना के जिलाधीश  को उसका मुकाबला करने के लिए महिला पुलिस भर्ती करनी पड़ी। सरकारी दमन के बावजूद यह आंदोलन तीव्र रहा। इसके साथ हीं इन्होने छिन्दवाड़ा और झालरपटन में रहते समय नारी समाज में जोरदार भाषण करके बाल विवाह, पर्दा, अशिक्षा आदि पर स्त्रियों को प्रकाश देती रही।

 

सन् 1919 ई. में बैरिस्टर श्री रामकिशोर लाल नंदक्यूलियार की पत्नी श्रीमति प्रियवंदा नंदक्यूलियार (मुंशी अंबिकाचरण की पुत्री) ने गया में राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में काम करते हुए, सन् 1921 ई. से खादी धारण की।

 

सन् 1921-22 ई. में श्रीमति अमला मुखर्जी ने मुजफ्फरपुर में पर्दा-प्रथा बहिष्कार आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभायी।

डाॅ.वी.पी.वर्मा की पत्नी श्रीमति पार्वती वर्मा सन् 1925 ई. में अखिल भारतीय वीमेन्स-कान्फ्रेस की सदस्या बनी। सन् 1927 से 1929 ई. तक महिला समिति (पुरूलिया) की सदस्या रही। वहां की स्त्रियों को अवैतनिक रूप से बुनाईकसीदा और पाकशास्त्र की शिक्षा दी।

 

इस तरह से हम देखते है कि सन् 1920 के अंत तक अधिक-से-अधिक महिला राजनीतिक और सामाजिक काम में भाग लेने लगी थी। इस समय जब कांग्रेस पार्टी ने साइमन-कमीशन के पटना आगमन पर बहिष्कार करने का निर्णय लिया तो हसन इमाम की बेगम व्यक्तिगत रूप से दुकान-दुकान घूमकर उनसे साइमन-कमिशन के विरूद्ध में दुकान बंद करने का अनुनय की और पूर्ण एकता से कांग्रेस का साथ देने को कही।  

 

निसंदेह रूप से अब यह दिखता है कि मुस्लिम महिला जो घर के अंदर तक सीमित थी। उभरकर सामने आयी और राजनीति कार्यों मे दिलचस्पी लेने लगी।

 

इसी तरह से स्व. श्री नवल प्रसाद (पटना में एडवोकेट) की पत्नी श्रीमति कामख्या देवी को सन् 1932 ई. के सत्याग्रह में महिलाओं का संगठित जुलूस निकालने के अभियोग में 6-महीने का कठोर कारावास हजारीबाग-सेंट्रल जेल में भोगना पड़ा।

 

सन् 1932 ई. में श्रीमति प्रभावति देवी को पहली बार विदेशी वस्त्र बहिस्कार में लखनऊ में गिरफ्तार किया गया और दुसरी बार सन् 1942 ई. मेें पकड़ी गयी।

 

श्री जगतनारायण लालजी (कांग्रेस के नेता और भारतीय हिन्दू महासभा के प्रधानमंत्री) की पत्नी श्रीमति राम प्यारी देवी ने सन् 1931 ई. रामगढ़-कांग्रेस के समय महिला-संघ की स्थापना की, जिसका उद्घाटन श्रीमति विजयालक्ष्मी पंडित के हाथों हुआ। इन्होने पर्दा और तिलक दहेज के युग में  समाज सुधार का यह अनुकरणीय आर्दश सामने रखी तथा पारिवारिक और सामाजिक विरोधी बाधाओं का सामना बड़े साहस से करती रही।

 

सन् 1930 ई. की जनवरी में पुनः अखिल भारत महिला सम्मेलन का आयोजन बंबई में हुआ, जिसमें बिहार की अनेक बहनें प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुई। बिहार के इस महिला जागरण के इतिहास में श्रीमति नंदकिशोर लाल और श्रीमति कमलाकामिनि प्रसाद के नाम उल्लेखनीय है। इनके तथा अन्य शिक्षित बहनों के प्रयास से बिहार की स्त्रियों में एक नये साहस का उदय हुआ था।

 

यह ब्रजकिशोर प्रसाद के अथक प्रयास का ही फल था कि काफी संख्या में बिहारी महिलायें सार्वजनिक सेवा में उतरी और रचनात्मक कार्यों में लगी। निसंदेह रूप से अब समाज रूढ़िवादी विचारधारा से धीरे-धीरे निकलकर आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ता नजर आ रहा था।

 

संदर्भ -

1.            सुरेन्द्र गोपाल, “श्री ब्रजकिशोर प्रसाद द फस्ट एसोसिएट आॅफ गांधी जी इन बिहार”, पृ.- 125-130, बिहार विद्यापीठ पटना, 2012

2.            शिवपूजन सहाय, “बिहार की महिलायें”, संपूर्ण, पटना, 1962। 

3.            अवधेश के. नारायण, ”श्री ब्रजकिशोर प्रसाद“, पृ.-28, श्री ब्रजकिशोर स्मारक प्रतिषठान पटना, 2007

4.            प्रभास्मृति, पृ.- 236-238, महिला चर्खा समिति पटना, 2006

5.            पी.एन.ओझा, ”हिस्ट्री आॅफ द इंडियन नेशनल काॅंग्रेस इन बिहार 1885-1985“, पृ.- 295-296, पटना, 1985

6.            के.सी.वसुदेवन, “द बलेजिंग ट्रेल आॅफ स्वामी विवेकानन्द”, पृ.- 67, द   क्वाट्रली जनरल आॅफ द मिथिक सोसाइटी, भोल्यूम-100, न.-1, जनवरी-मार्च 2009

7.            राजेन्द्र प्रसाद, ”आत्मकथा“, पृ.-81-85, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली, 2011

8.            संत कुमार वर्मा, ”बाबू ब्रजकिशोर प्रसाद“, पृ.-21, पटना, 1962

 

 

Received on 11.07.2014

Revised on 14.08.2014

Accepted on 10.09.2014     

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Research J. Humanities and Social Sciences. 5(3): July-September, 2014, 343-346